Monday, August 12, 2013

पहचान

जाने कितना समय निकल गया  
अपने आप को देखे हुए

जाने कितना समय निकल गया   
अपने आप से मिले हुए

आज देखा है सपने मैं एक चेहरा 
शायद खुद को न पहचान पाया

कितना  बदल गया हु मैं 
अब तो न वो सादापन हैं

 न वो जिद्दी हैं और कहा गई 
वो चेहरे की मुस्कराहट

लगता है बदल सा गया हूँ मैं 
खो गया हूँ मैं, नहीं जानता खुद को
जाने कितना समय निकल गया
आज मिलना हुआ फिर 
      अपने आप से

हाँ देखा मैंने उसके चेहरे पर 
ख़ुशी को, हँसी को और 
उसके दोस्तों का साथ

जब पलट कर खुद को देखा आईने मै 
बस दुःख और चिंता है

शायद पहले खुश था 
जब कुछ भी न था पर सब कुछ था 
आज सब कुछ होकर भी  कुछ नहीं,

जाने कितना समय निकल गया
जाने कितना समय निकल जायेगा 
फिर से मैं बन जाने में ………। 
  

Saturday, May 25, 2013

अब दिन नहीं गुजरता हैं यूँ आसां

अब दिन नहीं गुजरता हैं यूँ आसां ,
मन मैं एक युद्ध  सा चलता हैं ,

मैं अकेला नहीं हूँ आवाज़े हैं आस-पास ,
हाँ दिल को तन्हाइयों ने घेर रखा हैं ,

ये किसने काटे पंख मेरी कल्पनाओ के ,
ये किसने कैद किया मेरे मन को ,

लगता मैं आजाद नहीं ,
क्या मेरी इच्छाये ख़त्म हो गई ,

अब हर पल उदासी मैं रहता हूँ ,
अब दिन नहीं गुजरता हैं यूँ आसां,

ये धूप गिरती धरती पर ,
ये चमक क्यों चारो तरफ ,

या धरती हस रही हैं मुझ पर ,
मेरी नाकामयाबी पर, मेरी मज़बूरी पर ,
या मैं अपनी कमियों को देख रहा हूँ ,

दिनभर सोच मैं डूबा रहता हूँ कि ,
अब दिन नहीं गुजरता हैं यूँ आसां !  

Saturday, May 4, 2013

गज़ल

आँखों से जिनके नाम पे मोती बिखर गए 
उनसे मिले हुए तो ज़माने गुजर गए 

पत्ते तो वो भी थे जो गिरे हैं बहार में 
इल्जाम मौसमो के हवाओ के सर गए 

वो फूल जिंदगी की अलामत कहे गए 
खुशबु के नाम पर जो फ़ज़ा में बिखर गए 

आँखों के सएबान पे उतरी जो तेरी याद 
आँचल पे जाने कितने सितारे बिखर गए 

जैंसे थका परिंदा ठहर जाए शाख पर 
इस तरहा अशके गम सरे मिशगा ठहर गए 


अशकों ने तीरगी में बड़ा काम कर दिया
गम की अंधेर रात में जुगनू बिखर गए 

जलती हैं किस उम्मीद पे ऐ शम्मे आरजू 
उनको खफा हुए तो ज़माने गुजर गए 

मोती शनावरो का मुकददर हैं ऐ जीतू 
साहिल नशी तो शोरिशे तुंफा से डर गए .