अब दिन नहीं गुजरता हैं यूँ आसां ,
मन मैं एक युद्ध सा चलता हैं ,
मैं अकेला नहीं हूँ आवाज़े हैं आस-पास ,
हाँ दिल को तन्हाइयों ने घेर रखा हैं ,
ये किसने काटे पंख मेरी कल्पनाओ के ,
ये किसने कैद किया मेरे मन को ,
लगता मैं आजाद नहीं ,
क्या मेरी इच्छाये ख़त्म हो गई ,
अब हर पल उदासी मैं रहता हूँ ,
अब दिन नहीं गुजरता हैं यूँ आसां,
ये धूप गिरती धरती पर ,
ये चमक क्यों चारो तरफ ,
या धरती हस रही हैं मुझ पर ,
मेरी नाकामयाबी पर, मेरी मज़बूरी पर ,
या मैं अपनी कमियों को देख रहा हूँ ,
या मैं अपनी कमियों को देख रहा हूँ ,
दिनभर सोच मैं डूबा रहता हूँ कि ,
अब दिन नहीं गुजरता हैं यूँ आसां !
अब दिन नहीं गुजरता हैं यूँ आसां !
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